हे विप्र शिरोमणि---- सुशील शर्मा

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हे विप्र शिरोमणि---- सुशील शर्मा

Post by admin » Mon Apr 23, 2018 10:14 am

हे विप्र शिरोमणि

सुशील शर्मा

हे विप्र शिरोमणि परशुराम
मैं तुम्हे बुलाने आया हूँ।
अपने हृदय की व्यथा कथा
तुमको बतलाने आया हूँ।

हृदय व्यथित है बहुत विप्रवर
कैसे तुम से मैं बात करूँ।
अपने जज्बातों को प्रियवर
कैसे तुमसे मैं साक्षात करूँ।

राजनीति की चौपालों पर
ईमानों की बोली लगती है।
सत्य तड़पता है सड़कों पर
बेईमानों की डोली सजती है।


सोने की चिड़िया भारत अब
कर्ज में डूबा जाता है।
विश्वगुरु कहलाने वाला अब
सबसे अंतिम में आता है।

सरे आम शिक्षा बिकती है
ज्ञान सिसकता छलियों में।
शिक्षा को उद्योग बना कर
डाकू बैठे हर गलियों में।

रट्टू तोता बनकर बच्चे
बस्ते के बोझ से दोहरे है।
शिक्षा के संवादों में
सरकार के कान भी बहरे हैं।

आरक्षण की तलवारों से
प्रतिभाएं काटी जाती हैं।
धर्म और जाति की दीवारों से
मानव नस्लें बांटी जाती है।

सेना को अपमानित करके
राजनीति जो करते है।
भारत को गाली दे दे कर
देशप्रेम का दम भरते हैं।

मासूमों की इज़्ज़त को
सरे आम लूटा जाता है।
केंडिल मार्च की राजनीति कर
झूठा माथा पीटा जाता है।

हे विप्र श्रेष्ठ अब तुम आकर
कोई उपचार करो।
भारत को पुनः प्रतिष्ठित
करने का आप विचार करो।

परशु हाथ में लिए आप
अब दुष्टों का संहार करो।
दीन दुखी मज़लूमों का प्रभु
आकर तुम उद्धार करो।

हे विप्र शिरोमणि परशुराम
मैं तुम्हे बुलाने आया हूँ।
अपने हृदय की व्यथा कथा
तुमको बतलाने आया हूँ।
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