"रचनाएं भर रात जगाती नीद भगाती "----Sukhmangal Singh

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"रचनाएं भर रात जगाती नीद भगाती "----Sukhmangal Singh

Post by admin » Mon May 14, 2018 10:20 am

!!!
"रचनाएं भर रात जगाती नीद भगाती "
रात गुनगुनाकर कह जाती वही कहानी अपनी !
चार दिसंबर दोहजार सत्तरह लहुरावीर की बातें |
लोगों में भरा कितना कलियुगी असंख्य जीवन इतिहास
इठलाते - बलखाते व्यंग बराबर कसते करते उपहास |
इसे विडम्बना ही मानोप पर सच्चाई रातें सपने में करतीं बात
वह दिन भी देखा- सूना होगा ,छूटी वस्तु लोग लौटाते ...
पर देशों की परम्परा को राष्ट्र में हम नहीं ला पाते
और दक्षिण भारत की सभ्यता को भी हम नहीं अपनाते |
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों को भी बतलाऊं
उस गाथा को कैसे गाऊं अंधियारी वह रात सुनाऊं |
नहीं -नहीं खिलखिली धुप में घुप हंसता हुआ मित्र एक आता
अपनी वह पाथेय एकसौ छत्तीस रचना का साथ लेकर जाता |
सुनकर क्या कर सकते हो मेरी यह अमृत बीती गाथा
पर अभी समय है सोई नहीं वह मेरे परीश्रम की मौन व्यथा |
साइट पर मेरे विद्यमान है लेकर एक सुनहरी आभा
पर उसने व्यसन में अपने साथियों के साथ छाया गांठा |
कुतूहल थी जिन आँखों में उस दिन पानी भर मेरे आया
स्वच्छंद सुमन जो खिले थे कल तक प्रतिभा छाया गुनगुना उठी |
कहती ! ठहरो कुछ सोचो -विचार करो ,अपने भी घातक होते लहरी
हो चकित निकल आई सहसा ,कोमल पंखुड़ियां आँखों में गहरी |
'मंगल' सौन्दर्य जिसे कहते हैं ,अनंत अभिलाषा के सपने तुझमें
सुन्दरता मेरी आँखों को रह- रहकर समझा जाती है, और बताती !
हलकी सुशान की भाषा में मित्रों की दुर्बलता को भी गाती जाती है |
तुम्हें स्मित रेखा खींच कर एक संधिपत्र अभी से लिखना ही होगा
सदा उस अंचल मन पर उन्हीं मित्रों से भी कुछ - कुछ सीखना होगा |
नित्य विरुद्ध संघर्ष सदा विश्वास संकल्प अश्रु जल से !
आसमान में पक्षी उड़ती समंदर में तुझे उतरना होगा |
'मंगल' कहदो अपनी यादों को मुझे जलाना छोड़ दें
आंसूं बहाना व्यर्थ है रक्त बहाना छोड़ दें |
बहुत पहेलियाँ सुलझाया होगा अपने इस जीवन पल में !
सद्भाव - प्रेम पोथी पढाओ अपने उन विछुरे साथियों में ||

2018-05-07 4:17 GMT+05:30 sukhmangal <sukhmangal@gmail.com>:



मेरे सैमसंग डिवाइस से भेजा गया।





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Sukhmangal Singh
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