दोहा बन गए दीप -21 -------सुशील शर्मा

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दोहा बन गए दीप -21 -------सुशील शर्मा

Post by admin » Sat May 26, 2018 2:14 pm

दोहा बन गए दीप -21
सुशील शर्मा

थाली में रोटी नहीं ,ऐसे फूटे भाग।
मंहगाई डायन भयी ,तेल लगी है आग।

पीने को पानी नहीं ,घर में नहीं अनाज।
गेंहू चावल घूरते ,चढ़े टमाटर प्याज।

आग उगलती दोपहर ,पंछी हैं सब मौन।
सूरज दादा कह रहे ,हमसे बढ़ कर कौन।

मेहनत का फल खिल उठा ,फसल हुई भरपूर।
मंडी में लुटता फिरे ,कृषक बना मजदूर।

ट्राली के नीचे पड़ा ,भूखा सा मजदूर।
आग उगलती दोपहर ,ए सी पड़े हुजूर।

थाल सजाए रंग का ,खड़ी देहरी द्वार।
सतरंगी सपने हुए, चारो ओर बहार।

पीर उठी जब हिया में,पिया नही थे संग।
किससे जाकर मैं कहूँ,चढ़ा पिया का रंग।

प्रेम का दीपक जब जले,चहुँ ओर उजियार।
तमस घृणा का मिट गया,सतरंगी संसार।

कोयल ऐसी कूकती ,जैसे पिय की बात।
सौतन सी मुझको लगे ,उनके बिन बरसात।

अनुभव की अनुभूतियाँ ,भावों के चलचित्र।
शब्द स्याही बन गए ,उभरा चित्र चरित्र।

फागुन में दोहे लिखे, जेठ लिखे हैं छंद।
सावन गीत पुकारते ,कातिक भजनानंद।

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