सुख का उदगम माँ की गोद है--डॉ० श्रीमती तारा सिंह

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सुख का उदगम माँ की गोद है--डॉ० श्रीमती तारा सिंह

Post by admin » Wed Nov 21, 2018 4:13 pm

सुख का उदगम माँ की गोद है--डॉ० श्रीमती तारा सिंह

सुख का उदगम माँ की गोद है--डॉ० श्रीमती तारा सिंह
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संतान की इच्छाओं का , स्तर -स्तर हर्षित रहे
माता-पिता सर्वस्व लुटाने बरबस रहते सदा तैयार
सुरपुर का मीठा फल रखते उनके लिए सँभाल
मगर धिक्कार है ऐसे संतान को, जो अपने
बूढ़े माता-पिता से ,विमुख हो जीता
रखता नहीं उनका ख्याल ,बावजूद पिता चाहता
नहाते भी न टूटे ,मेरे पुत्र का एक भी बाल
न ही पांवों में पड़े , कभी कोई कंकड़ी का दाग

व्यर्थ है उसकी साधना,पूजा-पाठ, संन्यास
कर में धर्म -दीप न हो, तो सब है बकवास
चित्त प्रभु के चरणों में,चाहे जितना लगा ले
जितना कर ले तू दान-पुण्य, तप ,उपवास
नहीं मिलने वाला सुख-शांति का आवास
क्योंकि सुख का उदगम माँ की गोद है
पिता का प्यार है और है सेवा-धर्म प्रयास

इसलिए दायित्व ग्रहण कर एक अच्छी संतान का
क्या है माता-पिता की इच्छा , जान चिंता कर
कभी भी बुरे कर्म के लिए चरण उठाने से पहले
सोचो कहीं , तुम्हारी पद-ध्वनियाँ , तुम्हारी आने
वाली पीढ़ियों के कानों तक तो नहीं पहुँच रही
क्योंकि जैसा संदेश , भूमि से अम्बर को जायेगा
वहाँ से आने वाला , वैसा ही तो आयेगा


हो कोई दुनिया में ऐसा माता-पिता तो दिखा
जो हाथ जोड़कर देवी-देवताओं से कहे
हे देव ! हमें जीने दो , मरे हमारे बच्चे सगहे
वे तो चाहते, बरसे रंग रिमझिम गगन से
भीगे मेरी संतान का स्वप्न निकालकर मन से


एक पापी भी सजग हो , पुत्र के हित जीता
सोचता, त्रिलोक में जो भी सुख सुन्दर है
सब समेटकर अपने पुत्र के हाथों पर रख दूँ
विधु की कोमल रश्मि, तारकों की पवित्र आभाओं-
को दूध संग मिलाकर , गिलास में भर पिला दूँ
जिससे मेरा पुत्र रोगरहित , शोकहीन होकर जीये
यौवन की शिरा-शिरा में सुख -उल्लास नाचते रहे

लेकिन सब संतान ऐसा नहीं सोचता ,वह तो खुद
अमृत को पी , गरल गरल तृषित पिता को पिलाता
संतान के अत्याचार के तीव्र आँच पर
पिता का अपमानित मन, अकुलाता रहता
सोचता, दिन-दानवों से लड़कर जब निर्द्वंद्व हुए हम
तब धमनियों को बंद करने अपने ही खून चले आए
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