निरीह जीव...मांतापिता--------डां नन्द लाल भारती

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निरीह जीव...मांतापिता--------डां नन्द लाल भारती

Post by admin » Sat Dec 01, 2018 11:55 am

Nandlal Bharati

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कविता- निरीह जीव...मांतापिता ।

मांता पिता निरीह जीव हो जाते हैं

युवा होते ही अपने बच्चों के सामने

बेबस से लगने लगते हैं

मांता पिता जो स्वयं के

सपनों की आहुति देते देते

जिन्दगी के बसन्त गंवा चुके होते हैं

आस मे जीते हैं मांता पिता

बच्चे ऊंची से ऊंची उडान भरे

वे विहस पड़े

कई मांता पिता का त्याग भी

गुनाह के घेरे मे आ जाता हैं

अमानुष मां बाप की विष कन्या के आते ही

नेक निरीह मांता पिता कर दिये जाते हैं

बेगाने

धमकियां भी मिलने लगती हैं

कुछ करवा देने की

कत्ल तक करवा देने कि

दहेज के मामले मे बर्बाद कर देने कि

एक मांता पिता की उम्मीदे

लूट ली जाती हैं,बेटा बना लिया जाता है गुलाम

विषकन्या और उसके विषधर

मां बाप के हाथों

जिस बच्चे की ऊंची उड़ान के लिए

माता पिता खुद को तिल तिल मारते रहे

मर मर कर सीचते रहे सपना

वही नासमझ हो जाता है

अमानुष मां बाप और उनकी विष कन्या की

साजिशो की गिरफ्त मे

वह भी हो जाता है शामिल सुध्दि बुद्धि खोकर

सास ससुर और कुलक्षणा के साथ मिलकर

मांता पिता को देता है धकिया

मांता पिता को बच्चों से क्या चाह होती है

बस इतनी सी बच्चे ऊची उडान भरे

और माता पिता के दुनिया से विदा लेने पर

दे दे कंधा

इतनी सी ख्वाहिश भी लूटी जा रही हैं

विषकन्या और उसके अमानुष मां बाप द्वारा

बच्चे का मति भ्रम कर खडा किया जा रहा है

बना कर विरोधी

उगाये जा रहे हैं नये चूल्हे

मांता पिता को ढकेला जा रहा है

आश्रम के पथ पर,

ये साजिशें भी नहीं समझ पा रही हैं बच्चे

खडे हो जा रहे हैं अडियल बैल की

खींचने लगे लगे हैं कंधे जनाज से

युवाओं होश में आओ

सास ससुर पत्नी को दो सम्मान

मां बाप को कहा ऐतराज......?

मां बाप के कत्ल का तो ना करो ऐलान.।

डां नन्द लाल भारती

29 /11/2018
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