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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









बख्शीस

 

 

अंग्रेजों के ज़माने से, मुसलसल ये पलती रही,
गुलामी तो चली गयी, बख्शीस चलती गयी ।

 

आई सबको पसन्द, बन फ़रमाईश चलती रही,
दमे-सच निकलता रहा, शमाए झूठ जलती रही।

 

सहरे सच तो हुई, लत ए शब उड़ान थमती नहीं,
जाने क्या सबब था, दिन ढ़ले तक मचलती रही ।

 

शकल औ' सूरत में , सियासत बदल करती रही,
सँवर जाने की आस में, रियाया कर भरती रही ।

 

वो देंगें क्या जवाब, जुबाँ जिनकी बदलती रही,
व्यवस्था तो हुई ख़राब, जम्हूरियत चलती रही ।

 

मर्ज़ ला-दवा नहीं ये, दवा भी शफाखाने में है,
जुबाँ सच की मगर, दरबारे - खास खुलती नहीं ।

 

 

' रवीन्द्र '

 

 

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