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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









आज की सच्चाई

 

चमक तो दिखती है कम पर अधिक है भोपू का शोर
वह भी रूस्तम बन गया जिसका कम बाजू मे जोर

 

सिर्फ भपको के इषारो चल रहा संसार है अब
नीति नियमो के चलन की हुई बहुत निर्बल है डोर

 

सिर्फ दिखते पंख ही दो चार बस बिखरे हुये
कहा जाता है जहाॅ पर नाचते रहते है मोर

 

सुनी जाती है जहाॅ धन धान्य की सम्पन्नता
उजडे से दिखते है जब देखो तो सारे वे ही ठौर

 

बताते है जहाॅ पर है पूर्णिमा की चांदनी
वहाॅ पर दिखता नहीं है कहीं चंदा या चकोर

 

हरेक की ढपली अलग है अलग है अपना ही राग
कुछ समझ आता नहीं अब आ गया कैसा ये दौर

 

मन है मैला सबका इससे बढ गई नई उलझने
शाम की ढलती ललामी को भी कहा जाता है भोर

 

किसी के मन मे रहा अब कानून का कोई न डर
राह पर लाने को सबको चाहिये शासन कठोर

 

निरर्थक बकवास बिल्कुल बंद होनी चाहिये
कर्मनिष्ठा अधिक चाहिये और कम हो भोपू का शोर

 

 

प्रो सी बी श्रीवास्तव "विदग्ध"

 

 

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