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"मुझे, ऐ माँ!...."

 

maa

 

 

 

"मुझे, ऐ माँ! तेरा, लोरी सुनाना याद आता है,
तेरा गोदी की ज़न्नत में सुलाना याद आता है,

 

मैं तो बच्चा था, नादाँ था, थी दुनिया ख़्वाब की मेरी,
तेरा वो प्यार से सर थपथपाना याद आता है,

 

कभी कोई ख़ता मुझसे हुई तो माफ़ कर देना,
ज़रा सा डाँटना फिर मुस्कुराना याद आता है,

 

वो दौर-ए-मुफ़लिसी में भी नवाबी बख़्शना तेरा,
तेरा कागज़ से वो, चूल्हा जलाना याद आता है,

 

मुझे सब याद हैं लम्हे तुम्हारी इंतेज़ारी के,
पिता के वास्ते, वो गुनगुनाना याद आता है,

 

पिता का, सब्ज़ियाँ लाना, मुहब्बत हमसे वो करना,
तेरा सबके लिए रोटी बनाना याद आता है,

 

मेरा मक़्क़ा-मदीना तू मेरा मंदिर, मेरा क़ाबा,
लगा कर सीने से अमृत पिलाना याद आता है,

 

लगे शादाब के साए में गुज़रा है, मेरा बचपन,
तेरा हँसना, वो तेरा खिलखिलाना याद आता है,

 

मना जब भी मैं करता था, मैं कहता था, 'नहीं खाता',
बना के गाँव, वो खाना खिलाना याद आता है,

 

खिला कर पेट भर मुझको सुलाना वक़्त पर, ओ माँ!,
तेरा वो अलसुबह, मुझको उठाना याद आता है,

 

कभी वो एक भी मच्छर जो घुसता था मसहरी में,
तेरा वो जाग कर, उसको भगाना याद आता है,

 

मुझे मंजन कराना, जीभ धोना, वो रगड़ना, माँ!,
तेरा वो रोज़, नहेलाना-धुलाना याद आता है,

 

लगा कर तेल बालों में, हमारी कंघियाँ करना,
मेरे माथे पे वो, काज़ल लगाना याद आता है,

 

मुझे जब चोट लगती थी, तेरे आँसू निकलते थे,
तेरा मरहम लगाना, हड़बड़ाना याद आता है,

 

कभी बेसाख़्ता मैं रूठ भी जाता था , मेरी माँ!
तेरा मुझको मनाना, गुदगुदाना याद आता है,

 

तभी मैं सोचता हूँ, हम बड़े होते हैं क्यूँ आख़िर,
मुझे बचपन का वो अकसर ज़माना याद आता है।।"

 

 

 

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

 

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