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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









हमारी याद में आंसू बहाना तक नहीं आया

 

 

हमारी याद में आंसू बहाना तक नहीं आया
तकाज़ा इश्क का था जो निभाना तक नहीं आया
कभी तू फूल होती है कभी तू ख़ार होती है
है तेरे दिल में क्या तुझको बताना तक नहीं आया
जिसे हमदम कहा तुमने जिसे हमराज़ कहते थे
वही रोया है तो फिर चुप कराना तक नहीं आया
तुम्हे ग़म से उबारा जिसने उसको भूल बैठे हो
ये कर्जा इश्क का है ये चुकाना तक नहीं आया
तेरे हर एक सितम को हँसते-हँसते पी गया लेकिन
ख़ताओं को मेरी तुझको भुलाना तक नहीं आया
तुम्हारे पास बैठे हैं तुम्ही से है हसद जिनको
खरे लोगों से क्यूँ रिश्ते बनाना तक नहीं आया
ये रेल भीड़ का छीनेगा तेरे पाँव की धरती
नज़र अब तक तुझे तेरा ठिकाना तक नहीं आया
कोई ये उस से पूछे भटकूँ मैं इक पाँव से कितना
मेरी जानिब क्यूं हाथ अपना बढ़ाना तक नहीं आया
दरारें पड़ गयीं मेरी पुकारों में भी ऐ "फ़ानी"
सदा से पर सदा उसको मिलाना तक नहीं आया

 


फ़ानी जोधपुरी

 

 

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