अश्क़ आँखों से किसी रोज़ निकल जायेंगे

 

determination

 

अश्क़ आँखों से किसी रोज़ निकल जायेंगे,
तब कहाँ जाके बेचारे ये जगह पायेंगे।

 

अब समन्दर को ही नदियों की तरफ आना है,
है अना में भी कोई बात हम बतायेंगे।

 

चाँदो-सूरज ही हसीं आसमां की ज़ीनत है,
मिल गये हम भी अगर यूँ ही जगमगायेंगे।

 

बात बनती है अगर बनके बिगड़ जाने दो,
सर झुका है न कभी और न ही झुकायेंगे।

 

राह मंज़िल की बड़ी मुश्क़िलों से मिलती है,
और ग़लत रास्ते हर बार ही लुभायेंगे।

 

मेरी ग़ज़लों में मेरे दौर की गवाही है,
लफ़्ज़-अनमोल हक़ीक़त ही गुनगुनायेंगे।।

 

 

 

 

-करीम पठान 'अनमोल'

 

 

 

 

अना-स्वाभिमान
ज़ीनत-आभा

 

 

 

 

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