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बग़ावत

 

 

"अब कहाँ दम क़लम में 'राज़' बग़ावत लिखता,
भर के कालिख़ ज़माने भर की, सियासत लिखता,

 

लगा के सीने से दोस्त भोंके हैं पीठ पे खंज़र,
वक़्त के सीने पे खंज़रों से वो नफ़रत लिखता,

 

करे किससे वो मुहब्बत सभी दुश्मन उसके,
अब तो वो वक़्त का मारा है हिक़ारत लिखता,

 

खेलें जज़्बात से रहनुमाओरहगुज़र अब तो,
कौन सूफ़ी दौरेमातम में हिफाज़त लिखता,

 

अब तो पंछी भी नहीं मंदिरोमस्ज़िद के लिए,
बुतोतहरीर की पागल ही इबादत लिखता,

 

फ़िज़ाँगर्दूँ में कारख़ानों से निकलते धुएँ,
बंद करने के हुकुम, किसकी हिमाक़त, लिखता,

 

हो के बेपर्दा मिरे रक़ीब के जानिब वो चली,
भर के दीदों में लहू यार मुहब्बत लिखता,

 

डर है किस सिम्त उसकी जान ना चली जाए,
किस जिगर से मिरा वो दोस्त ज़ियारत लिखता,

 

अब तो ये भीड़ है नामर्दों की, बेहोशों की,
हुक़्मरानों की 'राज़' कौन ख़िलाफ़त लिखता।।"

 

 

(लगातार)

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

 

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