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जब भी कोई बात डंके पे कही जाती है

 

जब भी कोई बात डंके पे कही जाती है

न जाने क्यों ज़माने को अख़र जाती है

 

झूठ कहते हैं तो मुज़रिम करार देते हैं

सच कहते हैं तो बगा़वत कि बू आती है

 

 फ़र्क कुछ भी नहीं अमीरी और ग़रीबी में

अमीरी रोती है ग़रीबी मुस्कुराती है

 

अम्मा ! मुझे चाँद नही बस एक रोटी चाहिऐ

बिटिया ग़रीब की रह - रहकर बुदबुदाती है

 

'दीपक' सो गई फुटपाथ पर थककर मेहनत

इधर नींद कि खा़तिर हवेली छ्टपटाती है

 

 

दीपक शर्मा

 

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