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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









भीड़ मे चलते रहे और भीड़ ही मे खो गए

 

 

"भीड़ मे चलते रहे और भीड़ ही मे खो गए,
इसलिए कुछ कद्दावर भी क़द मे बौने हो गए।

 

अमृत पीने के लिए तो आतुर है सब रात दिन,
जब बारी मंथन की आई सब तान चादर सो गए।


वो फलां ऐसा , फलां वैसा ,यही कहते -कहते,
जो मशविरा देते थे आज दास्ताँ खुद हो गए।

 

घर के आलों को मयस्सर एक नहीं था जहाँ चिराग़ ,
रहनुमा क्या बन गए ,वर्क-ए-आसमां हो गए ।



थी बस्तियां नाबीनों की और गूंगा बहरा था निजाम ,
परछाईयाँ ही बेच कर मियाँ आलमपनाह हो गए ।

 

"दीपों को सूरज बनने में कभी वक़्त लगता ज़्यादा,
पर अब "दीपक' अंधियारों की दास चौखट के हो गए।

 

 

All rights @Deepak Sharma

 

 

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