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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









चाहत

 

 

ख़ार कोई, हमने कभी, अग़र यादों में चुभोया है,
कर ले यकीं, चेहरा अपना, अश्क़ों से भिगोया है ।

 

दिल हुआ रुसवा तो क्या, हमने कोई ख़बर न ली,
हर ख्वाब में बसाया, दरिया -ए- याद में डुबोया है ।

 

दिल से दुश्मनी है इसने, तुझे ठीक से जाना नहीं,
बींध कर रखा है देखो, नज़र के तीर में पिरोया है ।

 

उम्मीद की कश्ती को, जब कोई साहिल ना मिला,
हार कर ये दिल अपना, कोई सपना नया संजोया है ।

 

हर ख़्वाब था हक़ीक़त, जाने किसका, ये करम था,
एक तेरी ही चाहत में, हर करम हमने सनम खोया है,

 

 

( ख़ार = काँटा, thorn )

 

 

 

' रवीन्द्र '

 

 

 

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