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महज़ छत ही नहीं है धुप खाने के लिए

 

 

महज़ छत ही नहीं है धुप खाने के लिए,
कभी मैदान में उतारो जगमगाने के लिए,
इधर जब से बढ़ी है ठण्ड तुम कब्र में हो,
कभी बाज़ार में निकलो कप्कपने के लिए//
ये पेड़ ,शाख और पत्ते महज़ सुराग नहीं,
है कई घाव इनके रूह पे तदपड़ाने के लिए,
हवाओ को भी थान्दियो में मज़ा खूब आता है,
इन्हे मिलते है कई जिस्म गुदगुदाने के लिए//

 

 

ज्योतिप्रकाश सिंह

 

 

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