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ग़ज़ल उडाओ ना--फ़ानी जोधपुरी

 


ग़ज़ल


उडाओ ना इन्हें ए यार छत पे आने दो
परिंदे होते हैं मासूम चहचाहने दो


बहुत घुटन है मेरे दिल सी तेरे कमरे में
सुबह की धूप की किरने ज़रा सा जाने दो


तजुर्बा पायेगा ये दौर खुद के ज़ख्मों से
नसीहतें न करो इनको ज़ख़्म खाने दो


नसीब होता नहीं सब को लौट के आना
सुबह का भूला अगर हो तो लौट आने दो


बहुत मज़ा है शरारत में बच्चों की फ़ानी
छुपा दो चश्मे को दादी को बडबडाने दो

 

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