दीप सागर की सतह पर रात भर जलता रहा
दर्द का सूरज ह्नदय की गोद में पलता रहा
आदमी के बढ़ रहे हैं फासले
आदमी देखा किया और आदमी जलता रहा
ज़िन्दगी की बहर में कोई न मिल पाया रदीफ़
नाम लेकर शाइरी का काफ़िया चलता रहा
रात भर उड़ता रहा मन बादलों के साथ साथ
चांदनी के पास रहकर बर्फ सा गलता रहा
नयन से समझा न पाई जानकी श्रीराम को
शब्द बिषपायी बना अरु प्यार को छलता रहा
उम्र तो गुज़री मगर तू मुक्तदी निकला ‘सुशील’
यह सफर बस जुगनुओं के आसरे चलता रहा

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