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जो देखा ख़्वाब करता है वो ही दुनिया बनाता है

 

 

duniyabanata

 

"जो देखा ख़्वाब करता है वो ही दुनिया बनाता है,
हो जिसके बाजुओं में दम वो ही पर्वत हिलाता है,

 

बड़े कमज़ोर वो, मैय्यत से जो दामन बचाते हैं,
के जिस कंधे में ताक़त हो वो ही काठी उठाता है,

 

जिसे जाना हो हज़ पे, पास जिसको उस ख़ुदा का है,
दौर-ए-महँगाई में मुश्क़िल से वो, पैसे बचाता है,

 

क्या लाया था, क्या ले जाएगा, जिसने जाना दुनिया
में,वो दोनों हाथ से ख़ुशियों की बस दौलत लुटाता है,

 

बहाते-फेंकते हो तुम जिसे नफ़रत से दुनिया में,
वो क़तरा एक, पानी का, बड़ा सागर बनाता है,

 

कभी मामूली सा समझा किए जिसको ये जग वाले,
वो अदना एक इंसाँ, ज़ुल्म की हस्ती मिटाता है,

 

थी कितनी मुश्क़िलों से घास-फ़ूसों की बनी कुटिया,
वो क़ाफ़िर मज़हबों की आग से कुटिया जलाता है,

 

के खाया जिसकी थाली में, पला वो जिसकी नेमत
से, उसी की मौत पे क़मज़र्फ़ वो खुशियाँ मनाता है,

 

जो करता प्यार है माँ-बाप से और क़ौम से अपने,
वो कब शैतान की चौखट पे अपना सिर झुकाता है,

 

यहाँ नामर्द करते दिख रहे सौदा वतन का रोज़,
जो होगा मर्द वो सरहद पे जा कर सर कटाता है,

 

बिना मिहनत, मिली दौलत जिसे क़िस्मत से दुनिया
में, वो क़िस्से रोज़ अपनी जीत के मुझको सुनाता है,

 

कभी ख़ुशबू जिसे दी थी, बहारों में किसी गुल ने,
वो भौंरा रोज़ उसके पास जाकर गुनगुनाता है,

 

अजब फ़ितरत ज़माने में वो देखो 'राज़' आशिक़ की,
वफ़ा में चोट खाकर भी, वो अक़्सर मुस्कराता है।।"

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

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