tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh









धूप की साजिश ने तन झुलसा दिया

 

 

धूप की साजिश ने तन झुलसा दिया।
इस जुर्म को पेड़ों ने भी हवा दिया।

 

क्या कहें इस दौर की खाता - बही ने,
स्वार्थ जोड़ा, प्यार को घटा दिया।

 

जिसकी अाँखों में घटाअों का हुनर था,
वक्त ने उसे रेत का दरिया दिया।

 

शोख़ किरणों की मुजस्सिम आमदी ने,
झील को सरे शाम बहका सा दिया।

 

उस शज़र की फिक्र कुछ करिए जनाब,
उम्र भर जिसने तुम्हें साया दिया।

 

कुछ तो मजबूरी रही होगी " शोभा "
उसने मेरा ख़त मुझे लौटा दिया॥

 

 

 

डाँ शोभा श्रीवास्तव

 

 

HTML Comment Box is loading comments...