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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









ऐक एहसान तू मुझ पे मेरे हमदम कर दे

 

 

ऐक एहसान तू मुझ पे मेरे हमदम कर दे
मेरे अश्कों को मेरे ज़ख्म का मरहम कर दे

 

फिर ज़माने में नयी करबो-बला बरपा है
फिर मेरे दिल में अज़ादारी का मौसम कर दे

 

मान रख ले मेरी ग़ैरत का मेरी तश्ना लबी
तपते सहरा में बुलंद प्यास का परचम कर दे

 

फलसफा दिल के धड़कने का यही लगता है
जैसे सीने में बराबर कोई मातम कर दे

 

उसकी यादों ने पहन रक्खा है जो काला लिबास
अब तो हर माह मेरा माहे मुहर्रम कर दे

 

वो तुझे ममलिकते लफ्ज़ अता कर देंगे
उनकी चौखट पे रज़ा अपनी जबीं ख़म कर दे।

 

 

- हाशिम रज़ा जलालपुरी

 

 

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