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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









ग़मे विसाल रगों में उतर गया होता

 

 

ग़मे विसाल रगों में उतर गया होता
अगर ना तुझ से बिछड़ता तो मर गया होता

 

कभी लिबास की खुशबू कभी ज़ुबान का लम्स
मैं जाने कितनी हदों से गुज़र गया होता

 

महाज़े हिज्र पे जाने की उसको उजलत थी
वा गर ना आँखों का कश्कोल भर गया होता

 

हुसूले इल्म ने मसरूफ रक्खा वरना मैं
किसी को इश्क़ में बरबाद कर गया होता

 

ना जाने कब से तेरी मुंतज़िर हैं दो आँखें
तू मैकदे से कभी अपने घर गया होता

 

क़लम के बदले अगर तेग़ होती हाथों में
अदालतों की सज़ाओं से डर गया होता

 

"मुझे है तुम से मुहब्बत"यह उस ने बोला था
वो काश अपने कहे से मुकर गया होता।

 

हाशिम रज़ा जलालपुरी

 

 

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