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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









घर से निकलो तो ज़माने से छुपा कर निकलो

 

 

घर से निकलो तो ज़माने से छुपा कर निकलो ,

आहट हो ना ज़रा भी पावँ दबा कर निकलो.

 

लौट आयें ये खुदा फिर से वापस घर में

कही चलने से पहले अब ये दुआ कर निकलो .

 

राहें मकतल बनी हैं , तू बेकफ़न न रह जाए

इसलिए हाथ पे पता घर का लिखा कर निकलो .

 

अपने ही खून के हाथों में हैं खंज़र इसलिए

रोएगा कौन तुझ पे ,खुद को रूला कर निकलो .

 

 

ये दौर खून का हैं हवाओं में बह रहे नश्तर

घर के हर शख्स को सीने से लगा कर निकलो

 

 

 

कवि दीपक शर्मा

 

 

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