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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









तुम्हारे हिज्र में यूँ दिल के दाग़ जलते हैं

 

 

तुम्हारे हिज्र में यूँ दिल के दाग़ जलते हैं
किसी मज़ार पे जैसे चिराग़ जलते हैं

 

वो चाँद था या सितारा या फिर कोई जुगनू
फरार हो गया लेकिन सुराग़ जलते हैं

 

हमें नसीब नहीं रौशनी की ऐक किरन
और आसमान पे लाखों चिराग़ जलते हैं

 

अजब नहीं कि यहाँ रोज़ नामे मज़हब पर
ना जाने कितने मकाँ और बाग़ जलते हैं

 

फिर उसके बाद कोई शेर, शेर होता है
कई ज़मानों तक पहले दिमाग़ जलते हैं

 

यह कैसे रस्म चली है कि मयकदे में रज़ा
कहीं पे जाम, कहीं पे अयाग़ जलते हैं।
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हाशिम रज़ा जलालपुरी

 

 

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