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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









इश्क़

 

 

इश्क़ हमने भी, कर के देखा,
थोड़ा निगाह में, चढ़ के देखा ।

 

दर्द मिलता है, ये सुना करते थे,
क्यूँ सहते हैं सभी, सह के देखा ।

 

इश्क़ हमने भी, कर के देखा,
थोड़ा निगाह में, चढ़ के देखा ।

 

मुस्करा रहे थे, जो थे मुज़रिम,
गुनाह हमनें भी, कर के देखा ।

 

इश्क़ हमने भी, कर के देखा,
थोड़ा निगाह में, चढ़ के देखा ।

 

रोते भी हैं, न अश्क़ आँखों में,
है कैसी ये मुसर्रत, रो के देखा ।

 

इश्क़ हमने भी, कर के देखा,
थोड़ा निगाह में, चढ़ के देखा ।

 

रवाँ ज़िन्दगी, इश्क़ का मतलब,
ज़रा सा हमने भी , जी के देखा ।

 

इश्क़ हमने भी, कर के देखा,
थोड़ा निगाह में, चढ़ के देखा ।

 

 

 

' रवीन्द्र '

 

 

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