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जब इस कदर दिलों में अपने दूरी है

 

 

"जब इस कदर दिलों में अपने दूरी है,
फिर किसलिये प्यार का स्वाँग जरूरी है?

 

मैं भी चलूँ राह अपनी,तुम भी अपनी,
यही तुम्हारी इच्छा है, तो पूरी है।

 

कोई बंधन नहीं, चलो, आजाद रहो ,
तुम्हें नहीं तो हमको क्या मजबूरी है।

 

पत्थर को पिघला सकती है अगर नहीं,
तो समझो पूजा आपकी अधूरी है।

 

नहीं निभाना है आसान मुहब्बत का,
है ये जहर, नहीं, शराब अंगूरी है।

 

मेरी बातों का जवाब तक दे न सके ,
इससे ज्यादा और कौन मगरूरी है।

 

जब इस कदर दिलों में अपने दूरी है,
फिर किसलिये प्यार का स्वाँग जरूरी है?"

 

 


- गौरव शुक्ल

 

 

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