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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









जुल्म ढाने का तुम्हारा ढंग मन को भा गया

 

 

जुल्म ढाने का तुम्हारा ढंग मन को भा गया।
हर चुनौती से हमें हँसकर निपटना आ गया।

 

शुक्रिया काँटे बिछाने का हमारी राह पर,
यह कठिन हालात में चलना हमें सिखला गया।

 

जब जरूरत थी तुम्हारी तब दगा तुम दे गये,
जाइये अब वक्त हमदर्दी दिखाने का गया।

 

फूल की ख्वाहिश लिये पहुँचा तुम्हारे द्वार था,
सर वहाँ के पत्थरों से जोर से टकरा गया।

 

जिंदगी जिसको समझकर हम लगाते थे गले,
आज उसके नाम पर हर बेवफा शरमा गया।

 

जिस्म से बदबू तुम्हारे आ रही है गैर की,
अब हमारी आँख से हर एक उठ परदा गया।

 

बाढ़ का पानी घटा तो होश दरिया को हुआ,
चार दिन की चाँदनी थी व्यर्थ यूँ इतरा गया।"

 


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-गौरव शुक्ल
मन्योरा

 

 

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