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कभी साहिल का वो राजा, कभी तूफ़ाँ में क़श्ती है

 

kabhisahil

"कभी साहिल का वो राजा, कभी तूफ़ाँ में क़श्ती है,
महज़ मिट्टी का वो पुतला, कभी दुनिया की हस्ती है,

 

जहाँ मां-बाप का साया, वहाँ ग़म दूर रहते हैं,
के हम रहते सदा बच्चे, ये उनकी सरपरस्ती है,

 

मुझे मैक़द समझते जो, ग़लतफ़हमी है ये उनकी,
नशा जो मुझमें दिखता है, ये उन आँखों की मस्ती है,

 

यहाँ कोई ख़िलाफ़त ज़ुल्म का, कोई नहीं करता,
जहाँ के लोग बेआवाज़, वो मुरदों की बस्ती है,

 

कटाते सरहदों पर सर, फ़क़त वो मर्द, मेरे दोस्त!
यहाँ करते सियासत जो, वो नामर्दों की पस्ती है,

 

है बेशक़ हुस्न की मलिक़ा, मग़र मग़रूर है बेहद,
लगे जैसे के कोई टाट की, मख़मल में नस्ती है,

 

ख़ुले हैं 'राज़'! काफ़ी मैक़दे, दारू पिलाने को,
चले आवो! के सूफ़ी मैक़दे में माल सस्ती है।।

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

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