tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh









है कागज़ की कश्ती.

 

kagaz

 

 

 

"है कागज़ की कश्ती,..समन्दर में पानी,
है दो पल की दुनिया,फ़क़त आनी-जानी,

 

के तिनके उड़ें,ज़ोर से आँधियों के,
तू रख दे पहाड़ों सा भारी निशानी,

 

तू कर जा ज़माने में कुछ काम ऐसे,
ज़माने में जिसका,न हो कोई सानी,

 

अगर तू आदमी है..!तो इंसान हो ले,
कभी आँख में भर,मुहब्बत का पानी,

 

न करना कभी बेईमानी वफ़ा से,
कभी भी न हो तेरा जीना बेमानी,

 

बदन में हो आतिश,करम पीर से रख,
खुदा ने जो बख़्शी है...तुझको जवानी,

 

तेरा जिस्म मिट्टी का पुतला फ़क़त है,
तेरा फ़लसफ़ा हो,.....मुहब्बत रूहानी,

 

अगर नेक़ नीयत से ज़िन्दा रहे तुम,
तो दुनिया लिखेगी...वो तेरी कहानी,

 

कहानी का वाली मिरा "राज़" जिसके,
इरादों में लोहा,.......लहू में रवानी।।"

 

 

 

संजय कुमार शर्मा

 

 

 

HTML Comment Box is loading comments...