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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









मज़हब -ए- इश्क़

 

 

ज़ुस्तजूं मेरी, तेरी नज़र के पैमाने हैं,
आज क़दमों में मेरे, सारे मयख़ाने हैं ।

 

 

हर एक शाखे - शज़र , दे रही है दुआ,
महक -ए- गुल के, लुट रहे खजानें हैं ।

 

 

एक कतरे के लिये, तड़पती है दुनिया,
रोशन जमाल से, शहर के बुत-खाने हैं ।

 

 

तसव्वुर पे बंदिश, ना ज़ंजीरों में जेहन,
दिले - मख़सूस के, खुले हुऐ ताले हैं ।

 

 

जलती हुई शमा, है खनकता मैख़ाना,
भरे तेरी ख़ामोशी ने, लबों के प्याले हैं ।

 

 

इबादत, परस्तिश, या कह लो मुहब्बत,
ज़रा सी झलक के, आशिक़ सब पुराने हैं ।

 

 

नादान है फ़ितरत, ज़र्रे ज़र्रे में मुहब्बत,
ज़फ़ा ने इल्म पे, कितने नक़ाब डाले हैं ।

 

 

हो नहीं सकता , वो महरूम मुहब्बत से,
ग़ैर को अपना यहाँ, कोई अगर माने है ।

 

 

इश्क़ मज़हब है, वाज़िब हक़ इस पे मेरा,
रूहानी मुहब्बत के, मिलते कहाँ दीवाने हैं ।

 

 

कह गया 'रवि', रौ-ए-ज़ज्बात में बह कर,
कितने ही ज़माने को, हाफ़िज़ अफ़साने हैं ।

 

 

( ज़ुस्तजूं = eternal search; जमाल = Beauty, सुंदरता ; तसव्वुर = Imagination, कल्पना; मख़सूस = Special, ख़ास, विशेष; ज़फ़ा = Un-faithfulness; महरूम = Devoid of, incapable of getting; वाज़िब = justified; हाफ़िज़ = In memory )

 

 

 

' रवीन्द्र '

 

 

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