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मेरा हमदम...

 

 

"मेरा हमदम कोई ताज़ा गुलाब लगता है,
हुस्न की भीड़ में वो इक नवाब लगता है,

 

बिना पिए जिसे हो जाए आदमी मैक़द,
सदियों पुरानी कोई उम्दा शराब लगता है,

 

जिसका हर इक सफ़ा लिखा हुआ हो शिद्दत से,
किसी शायर की ग़ज़ल लाजवाब लगता है,

 

ज़िन्दग़ी तेरे सवालों से मैं, परीशाँ क्यूँ रहूँ,
वो हर सवाल का, हाज़िर जवाब लगता है,

 

कभी हिन्दू,कभी मुझे वो,मुसलमाँ करता,
मुझे तो वो कोई सूफ़ी क़िताब लगता है,

 

उमर जो भी हो मेरे यार की मगर, सुन लो!
मुझे हर पल वो, सोलह का शबाब लगता है,

 

ज़माने भर की ठंडक ने रखा क़दम जैसे,
मुझे ज़मीन पर वो माहेताब लगता है,

 

मेरी साँसें, वो मेरी जान, मेरा चैनोसूकूँ,
बगैर उसके मुझे खाना ख़राब लगता है,

 

के उसके दीद से, बदन में मिरे आग भरे,
मुझे तो "राज़" वो इक आफ़ताब लगता है।।"

 

 

संजय कुमार शर्मा "राज़"

 

 

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