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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









मेरी बाँहों में समाने को आ के लौट गये

 

 

"मेरी बाँहों में समाने को आ के लौट गये;
वो आज फिर से बहाना बना के लौट गये।

 

मेरी किस्मत भी खुलते खुलते खुलते खुल न सकी,
सारे अरमानों पे पानी फिरा के लौट गये।

 

अब मिलेंगे तो सबसे पहले यही पूछूँगा,
आप क्यों कर हमें तड़पा तपा के लौट गये।

 

इतनी जल्दी थी घर जाने की तो आये क्यूँ थे,
इक झलक अपनी दिखाई, दिखा के लौट गये।

 

कितने दिन और ये दीवार रहेगी कायम,
हमसे फिर राज आज ये छिपा के लौट गये।

 

मेरे जज्बात उफनते रहे भीतर भीतर,
मेरी बेताबियों पे मुस्कुरा के लौट गये।

 

उनसे जालिम हैं नखरे उनके, अदायें उनकी,
पहले सुलगाई आग, फिर बुझा के लौट गये।

 

हमसे बोले कि करो सब्र, हम तुम्हारे हैं,
हमको फिर आसमान पर चढ़ा के लौट गये।

 

उनकी पाकीज़गी पे और प्यार आता है,
और इज्जत मेरे दिल में बढ़ा के लौट गये।

 

 


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- गौरव शुक्ल
मन्योरा

 

 

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