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मिरे सागर में तेरा क्या..

 

 

miresagar

 

 

 

"मिरे सागर में तेरा क्या, कई नदियों का पानी है,
तू चलती है, मैं ठहरा हूँ, बस इतनी सी कहानी है,

 

नहीं बस खेलना-खाना, ख़ुशी दो पल की, दो पल ग़म,
तमाशा चार दिन का और ये दुनिया आनी-जानी है,

 

यहाँ के लोग आमादा, वतन के वास्ते मिटने,
यहाँ के आब में तूफ़ान, मिट्टी में रवानी है,

 

ये जलता है, पिघलता है, मचलता है, संभलता है,
ये मसला पाँच वक़्तों का, कोई क़िस्सा रूहानी है,

 

जो आया है वो जाएगा, क्या दौलतमंद, क्या मुफ़लिस,
यहाँ मरना लिखा सब का, सभी का जिस्म फ़ानी है,

 

के मुँह मत खोल! इस दुनिया में जो होता है होने दे,
के रह कर आब में, घड़ियाल से लड़ना बेमानी है,

 

नपा-तौला तू ले कर इस ज़मीं पर आया है, सुन ले!,
है पागल 'राज़' ने तक़दीर से लड़ने की ठानी है,

 

मिले गुल सैकड़ों, कहते थे, 'मेरी ख़ुशबुएँ ले लो',
मैं तुझसे इश्क़ करता हूँ, ये मेरी क़दरदानी है,

 

न जाने? उसके-मेरे बीच की है ये लग़ी कैसी,
के मैं उसका दीवाना हूँ, के वो मेरी दीवानी है,

 

'मेरे अब्बा, कभी रुसवा न होने दूँगी ' कहती है,
मेरी बेटी, मेरी लख़्तेज़िगर लगती सयानी है,

 

बुज़ुर्गों की ना तोहमत कर, वो सब तुझ पर भी गुज़रेगी,
कहानी चार पल की, आदमी की ये जवानी है,

 

ये जाने कौन....? ये दुनिया, कहाँ पर ख़त्म हो जाए,
लो फ़िर ईद-उल-फ़ितर है, ये ख़ुदा की मिहरबानी है,

 

वो सूफ़ी पीर है मेरा, वो इक शमशीर है मेरा,
बता मुझको, क्या कोई 'राज़' का दुनिया में सानी है?"

 

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

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