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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









मुद्दतों बाद

 

 

मुद्दतों बाद महबूब का दीदार हुआ ,
कि चाँद आकर मेरे दिल में आफताब हुआ ।


नजर हजार उठाई मगर वो उठ न सकी ,
कलेजा फट के बाहर आने को बार बार हुआ ।


जो कसमें खाई थी कि उनसे अब वास्ता कैसा ?
बेरुख़ी वो खुद ही तार तार हुआ ।


नहीं मिला जो उनसे तो मुद्दतें बीती,
मगर मिला जो एक बार तो बार बार हुआ ।


दिल मे उनके जो नफ़रतों की दुनिया थी ,
जला वो ऐसे कि सब दाग खार खार हुआ ।

 

 


कामिनी कामायनी ॥

 

 

 

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