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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









मैं नये दोस्त बनाते हुए थक जाता हूँ

 

 

मैं नये दोस्त बनाते हुए थक जाता हूँ
सब को सीने से लगते हुए थक जाता हूँ

 

अब्र का टुकड़ा हूँ मैं कोई समंदर तो नहीं
प्यास सहरा की बुझाते हुए थक जाता हूँ

 

तू मेरे राज़ बताते हुए थकता ही नहीं
मैं तेरे राज़ छुपाते हुए थक जाता हूँ

 

सुबह से शाम तलक घर से मियाँ दफ्तर तक
जिस्म का बोझ उठाते हुए थक जाता हूँ

 

मेरी क़दमों से लिपट जाती है माँ की ममता
मैं कहीं गाँव से जाते हुए थक जाता हूँ

 

जाने कब जा के मेरा इश्क़ मुकम्मल होगा
रक़्स करते हुए गाते हुए थक जाता हूँ।

 

 

- हाशिम रज़ा जलालपुरी

 

 

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