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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









वो नज़रों में गिरा सा लग रहा है

 

 

 

वो नज़रों में गिरा सा लग रहा है,
मुझे जीना सजा सा लग रहा है,
भुलाना चाहता है दिल उसे पर,
ये कोई सिलसिला सा लग रहा है,
मैं टूटा हूँ यहाँ कुछ इस कदर कि,
हर इक मुद्दा ज़रा सा लग रहा है,
जुबां पर ला रहा हूँ फिर तुम्हें मैं,
न जाने क्यूँ खुदा सा लग रहा है,
चलो रिश्तों में खुद को बाँट डालें,
हर इक रिश्ता भला सा लग रहा है,
उसूलों की जगह लालच ने ले ली,
यहाँ सब कुछ बिका सा लग रहा है,
नज़रअंदाज़ मत कर देना "अंकुर",
हर इक मेहमाँ जुड़ा सा लग रहा है,

 

 

अस्तित्व "अंकुर"

 

 

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