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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









पहल

 

 

एक यही मुश्किल, बस सरल नहीं होती,
मुहब्बत में हमसे, बस पहल नहीं होती ।

 

 

कमी सितारों की, इस कमसिन रात में,
ये चाँद तन्हा औ, शब चहल नहीं होती।

 

 

लाख हों जलवे तेरे, ऐ महफिले-तन्हाई,
समझो बिन वफ़ा, मन बहल नहीं होती ।

 

 

मानिंद सावन कोई , हर दम बरसता है,
दीद मोहताजे-वफ़ा, एक रकम नहीं होती।

 

 

कमी यादों की या, बेनयाज़ी-ए-इश्क़ की,
बेरूखी इस दिल की, अब सहन नहीं होती ।

 

 

एक यही मुश्किल, बस सरल नहीं होती,
मुहब्बत में हमसे , बस पहल नहीं होती ।

 

 

 

' रवीन्द्र '

 

 

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