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शाम होते ही खयालों में चले आते हैं

 

 

"शाम होते ही खयालों में चले आते हैं।
वो कौन हैं मेरे, जी क्यों मेरा दुखाते हैं।

 

जिन्हें निगाह से पहले बहुत उतार चुके,
क्यों उतर जेहन से भी मेरे नहीं जाते हैं।

 

एक मुद्दत से पलटकर तुझे नहीं देखा,
तेरी तस्वीर मगर हूबहू बनाते हैं।

 

वो नाक-नक्श,वह अदा,वो रेशमी जुल्फें,
जमाल वो, असर अपना वही दिखाते हैं।

 

तेरे चेहरे की खुशी देख के दुनिया वाले,
मेरे गमों की दास्ताँ समझ न पाते हैं।

 

कितना बेबस है दिल के आगे आदमी अपने,
मेरी गजल के हर्फ-हर्फ ये बताते हैं।

 

जिंदगी नाम है घुट घुट के जिये जाने का,
लोग नाहक ही यहाँ चीखते चिल्लाते हैं।

 

मेरा तजुर्बा है ये गाँठ बाँध कर रख लो,
मुफलिसी में न लोग दोस्ती निभाते हैं।

 

 


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- गौरव शुक्ल
मन्योरा

 

 

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