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थक गई आँखें मिली ना--सुधीर कुमार प्रो्ग्रामर

 


थक गई आँखें मिली ना सोम से रविवार अबतक
खूबसूरत सी खबर की खोज में अखबार अबतक।

 

तितलियाँ पकड़ी गई, मसली गई हरवार फिर भी
अनसुनी अर्जी लिए लथपथ खड़ी दरबार अबतक।

 

आँधियों को जब तरस आई नहीं मासूमियत पर
इसलिए मजदूर का धरती सटा घर-बार अबतक।

 

रोज की तकरार से है बेहतर जयघोष कर दो
क्यों खड़ी है बीच में ये चीन की दीवार अबतक।

 

लाल आया ताबुतों में आखरी सिन्दूर लेकर
मातमी वातावरण में वीर के परिवार अबतक।

 

सोचता हूँ कल सुबह खुषियाँ लिए सूरज उगेगा
पर तबाही को खड़ी है वक्त की तलवार अबतक।

 

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