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तावीज़ बना कर कोई वादा नहीं पहना

 

 

तावीज़ बना कर कोई वादा नहीं पहना
इस बार मोहब्बत का इरादा नहीं पहना

 

चलना ही मुक़द्दर था तो चलता ही रहा मैं
पैरों में कोई घर, कोई जादा नहीं पहना

 

वो जनवरी की ठन्ड से लड़ती रही लेकिन
उस ने मेरे बदन का लिबादा नहीं पहना

 

खुश रंग ख्वाहिशों का वो बद रंग सा लिबास
अच्छा हुआ जो मैंने ज़ियादा नहीं पहना

 

हम शायरी में जौन* के क़ायल हैं इसलिए
बूढ़ी रिवायतों का लिबादा नहीं पहना

 

दरवेश कह रही है ये दुनिया उसे रज़ा
जिस शख्स ने लिबास भी सादा नहीं पहना।

 

 

*- हाशिम रज़ा जलालपुरी

 

 

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