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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









तेरी यादों को, तेरे ग़म को संभाले हुए हैं

 

 

तेरी यादों को, तेरे ग़म को संभाले हुए हैं
वरना हम लोग तो महफ़िल से निकाले हुए हैं

 

ज़िन्दगी अपनी अंधेरों में बसर करते हैं
शहर में जिनकी बदौलत यह उजाले हुए हैं

 

जो सरे बज़्म मेरे नाम से जल जाते थे
अब वही लोग मेरे चाहने वाले हुए हैं

 

बैयते ज़ुल्म के इंकार में अक्सर हम लोग
कभी नैज़ा, कभी खंजर के हवाले हुए हैं

 

उनको मालूम तो है कल कभी आता ही नही
आज का काम जो कल के लिए टाले हुए हैं

 

सब समझते हैं हमें वक़्त की आवाज़ मगर
कोई मिसरा ना कोई शेर उछाले हुए हैं

 

आँखें कुछ इतना चलीं उसके तआक़ुब में रज़ा
अब के पैरों में नहीं आँखों में छाले हुए हैं।

 

 

हाशिम रज़ा जलालपुरी

 

 

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