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तुमको पाने को तरसता है बहुत

 

 

"तुमको पाने को तरसता है बहुत,
शख्स वह टूट अब चुका है बहुत।

 

चोट गहरी उसे लगी होगी,
आज ऊपर से वो गिरा है बहुत।

 

उससे इजहारे-मुहब्बत न हुआ,
दिल से उसने तुम्हें चाहा है बहुत।

 

दोस्तों से है निपटना मुश्किल,
दुश्मनों से नहीं खतरा है बहुत।

 

भूल भी जाँये तो कैसे भूलें,
बंद आँखों को भरोसा है बहुत।

 

लाया जज्बात है तोहफे की जगह,
आशिकी का न तजुर्बा है बहुत।

 

रोशनी भी उधर नहीं जाती,
जिधर गली में अँधेरा है बहुत।

 

 

 

-गौरव शुक्ल
मन्योरा

 

 

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