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उमड़ती नहर और कनकन महीना--सुधीर कुमार प्रोग्रामर

 

 

उमड़ती नहर और कनकन महीना
हसीना नहाने का ढूंढ़े बहाना।

 

लजाई हवा तन-बदन में समाके
छहर-छहर जाए ये मौका सुहाना।

 

दयावान सूरज जो देखा तमाषा
हयादार किरणें पसीना-पसीना।

 

बहकते कदम की सुलगती कहानी
टटोले अँगूठी कुरेदे नगीना।

 

नहर बेखबर, बेखबर है जमाना
मिला षायरी को अनोखा तराना।

 

परेषान हम और हलकान दुनिया
मगर दायरे में दिवानी दिवाना।

 

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