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वो मेरी ख़ातिर..

 

womerikhatir

 

"वो मेरी ख़ातिर कोई ताज़ा गुलाब रखती है,
इश्क़ का तौल के वापस हिसाब रखती है,

 

के मिरे वास्ते देखो तो मुहब्बत उसकी,
मैं न लुट जाऊँ, सोच के निक़ाब रखती है,

 

कैसे ज़ख़्मी करें मेहबूब को, शमशीर बिना,
इसका शातिर हुनर वो लाजवाब रखती है,

 

के कैसे बख़्शनी है जान किसी आशिक़ की,
पास इसका भी वो, मेरा नवाब रखती है,

 

कैसे मिलना है बड़ी शिद्दत से बह के सागर से,
इसका जज़्बा मेरा दरिया चनाब रखती है,

 

कहाँ लुटाना है, कहाँ से ले के जमा करना है,
इसका हर सूँ, मेरी जाँ इन्तख़ाब रखती है,

 

अजीब हुस्न है ग़ाफ़िल बदन सुलगता सा,
सरे दिन चाँद, रात आफ़ताब रखती है,

 

वो जानती है के, मिरा नशा वो है ख़ुद ही,
अपने होठों का आब-ए-क़ौसर शराब रखती है,

 

सीखने,बिन कहे कहना, बिना सुने सुनना,
पहलू में 'राज़' की सूफ़ी क़िताब रखती है।।"

 

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

शब्दार्थ- निक़ाब=नक़ाब। शमशीर=तलवार,खांडा। हुनर=करतब,चतुराई। ज़ख़्मी=घायल
आफ़ताब=सूर्य। इन्तख़ाब=चुनाव,चयन। ग़ाफ़िल=बेख़बर,असावधान। आब-ए-क़ौसर=बहिश्त की क़ौसर नामक नदी का पानी जो अतिउत्तम, स्वादिष्ट और पवित्र माना जाता है।

 

 

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