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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









ये ग़ज़ल

 

 

महज़ एक शौक नहीं, जिंदगी की असल भी है,
अल्फाज़-ए-मिजाज़ औ' जिंदगी की शकल भी है ।

 

महबूब से मुहब्बत का , हसीं इज़हार भी है,
मुद्दत से बिछड़े दिलों को मिला करार भी है ।

 

तमन्नाओं के समंदर का सख्त इंतज़ार भी है,
रूठे यार को मनाने का , जज़्बा प्यार भी है ।

 

अफसाना मुहब्बत के मारों का दर्दे-ज़िक्र भी है ,
रूह की रेत पर रुके, लम्हों के निशानात भी है ।

 

क़ैद मज़बूर परिन्दों की, फरियादे- सय्याद भी है,
वसले यार को तड़पते दिलों की ये आवाज़ भी है ।

 

शायरी कोई आम नहीं, ये रूह की फ़रियाद भी है,
महज़ एक शौक नहीं, जरुरत रूह-ए-ग़ुसल भी है ।

 

 

 

' रवीन्द्र '

 

 

 

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