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Administrator Dr. Srimati Tara Singh









ज़िन्दगी कहती है साँसों के सराबों से निकाल

 

 

ज़िन्दगी कहती है साँसों के सराबों से निकाल
ऐ खुदा! मुझको मोहब्बत के अज़ाबों से निकाल

 

इनकी ताबीरों से बहते हैं लहू के आँसूं
मेरी आँखों को सुलगते हुए ख़्वाबों से निकाल

 

जंग करने पे हैं आमादा मेरे दिल और दिमाग़
कश्ती-ए-जान को मिटटी के चनाबों से निकाल

 

बा खुदा मैं अलग हो जाऊँगा उस से लेकिन
पहले तू रंग को, खुशबू को गुलाबों से निकाल

 

नफरतों का जो सबक देते हों उन लफ़्ज़ों को
पाक दिल, फूल से बच्चों की किताबों से निकाल

 

जिनके किरदार से खुशबू नहीं बदबू आये
ऐसे अफ़राद को मज़हब के निसाबों से निकाल

 

हो ना जाए कहीं ग़ज़लों का तक़द्दुस पामाल
सिन्फ़े नाज़ुक को रज़ा खाना ख़राबों से निकाल।

 

 

हाशिम रज़ा जलालपुरी

 

 

 

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