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.अब हम तुझसे .

 

 

अब हम कहे तुझे क्या सनम
क्या खलुस हमारे जिगर में है .
ठ्हरी हुई काली घटा ,
चर्चे मे अब भी शहर के हैं .
भट्के चले जिस मोड पर ,
मंजिल .के काफी करीब था ,
वह सख्स भी तो अजीब था ,
जिसे दर्द था न निशात ही .
हर शै पै पर्दा डाल कर ,
अब खुद ही सबकी नजर में है .
चाहत भी उसकी बडी अजब ,
पर वफा किसी से ना कर सके ,
अब कौन देखता उन्हे
हैं वफा लिए वो भट क रहे ,.
जो न अब मेरे तसव्बुर में है .
उनका खयाल हम क्या करे.

 

 


कामिनी कामायनी .

 

 

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