tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






 

 

तेरे सिम्त सजती हैं बज़्मे-बहाराँ

 

 

by......  Chandra Bhushan Mishra Ghafil

 

तेरे सिम्त सजती हैं बज़्मे-बहाराँ,
मेरे सू तो मेरी ही शैदादिली है।
तुझे हो मुबारक़ जमाने की रँगत,
ता'हद्दे-नज़र मेरे स्याही खिली है॥

 

नयी क़ैफ़ियत ये नये दौर की है,
तिहीदस्ती फ़ैय्याज़ों में जोर की है।
समन्दर के दर पे भी जा करके देखा,
मेरी प्यास उससे कहीं भी भली है॥

 

वो ताबानी सूरज की बदली में गुम है,
चमक चाँदनी की भी जुगुनू से कम है।
हैं दरिया की लहरें सराबी-शिगूफा,
सज़र भी हैं मुफ़लिस, हवा बद चली है॥

 

गया सूख बेवक़्त आँखों का पानी,
नहीं गीत में भी है कोई रवानी।
छमक भी है गायब सभी पायलों से,
पड़ी आज सूनी सी सुर की गली है॥

 

अगन ने जलाया मेरा आशियाना,
ग़ाफ़िल भी है आज कैसा बेगाना।
हरी वादियों का हुआ रंग खूनी,
चिता आल की सबसे पहले जली है॥

 

हुई किस क़दर रात चोरी यहाँ पे,
बता चाँद सबकी है ख़ूबी कहाँ पे।
जो गुल ख़ूबसूरत तो ख़ुश्बू जुदा है,
जो तोड़ी गयी है वो नाज़ुक कली है॥

 

 

(सू=तरफ़, तिहीदस्ती=हाथ का खालीपन, फ़ैयाज=दानी, सराबी-शिगूफ़ा=मृगमरीचिका जैसा भ्रम, आल=नाती,पोते)

 

 

 

 

HTML Comment Box is loading comments...