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जी हाँ मैडम ! मैं एक गाँव वाला हूँ

 

 

मेरा बचपन खेतों ने दुलराया है,
गायों भैंसों के बीच प्यार पाया है।
बैलों को मचियाकर हल खूब चलाया,
भैंसों को तालाबों में जा नहलाया।

 

मेहनत की भाषा का हर पाठ पढ़ा है,
मेरा चरित्र मजदूरों बीच गढ़ा है।
मैंने न वक्त काटा है, उसे जिया है;
कह मुझे गाँव वाला ईनाम दिया है।

 

हूँ मन का साफ भले तन से काला हूँ।
जी हाँ मैडम ! मैं एक गाँव वाला हूँ।

 

है मुझे गाँव का अपने कणकण प्यारा,
हर एक व्यक्ति है यहाँ स्वयं में न्यारा।
हम पहचानते एक दूजे की सूरत,
हैं एक दूसरे की जानते जरूरत।

 

लड़ते हैं लेकिन दुख में साथ निभाते,
मौका पड़ने पर सदा एक हो जाते।
अनुराग अशेष उमड़ता इस धरती पर,
इसके प्रति अतुल स्नेह है मन के भीतर।

 

है मुझे गर्व, मैं गया यहाँ पाला हूँ।
जी हाँ मैडम ! मैं एक गाँव वाला हूँ।

 

रूढ़ियाँ हमारी हैं पहचान हमारी,
पुरखों के बाँधे नियम आज तक जारी।
हम उन पर तर्क वितर्क नहीं करते हैं,
बस आँख मूँद कर उसी राह चलते हैं।

 

संस्कृति का असल स्वरूप यहाँ दिखता है,
सच्चा भारत इन गाँवों में बसता है।
'सभ्यता' नई आने से है घबराती,
इसलिए हमें दुनिया गँवार बतलाती।

 

मैं भी उस ही गँवारपन में ढाला हूँ।
जी हाँ मैडम ! मैं एक गाँव वाला हूँ।

 

हक से कहिये जाहिल,उजड्ड ,देहाती;
है हमें औपचारिकता नहीं सुहाती।
हम नहीं आपके साथ बैठने लायक,
सभ्यता आपकी हो आपको मुबारक।

 

मुँह लीप पोत कर आप सभ्य कहलायें,
यह अंग्रेजियत सीखकर मन बहलायें।
अपने पड़ोसियों तक के नाम न जाने,
रहने दें ऐसी सीख हमें सिखलाने।

 

मैं अपनी परंपरा में मतवाला हूँ।
जी हाँ मैडम ! मैं एक गाँव वाला हूँ।

 


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-गौरव शुक्ल
मन्योरा

 

 

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