tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






 

 

फिर हृदय के तार को छेड़ा किसी ने

 

 

फिर हृदय के तार को छेड़ा किसी ने,
होश फिर उड़ से गये हैं आज मेरे।


[1]
कर दिया घायल हमारी चेतना को,
फिर किसी ने तीर नजरों के चलाकर,
लूट कोई ले गया फिर चैन मेरा,
रूप की मदिरा इशारों से पिलाकर।

 

जिंदगी की चाह फिर से जग गई है,
कामनाएँ फिर लगीं आकार लेने;

 

फिर चपलतायें मुखर होने लगी हैं,
फिर बहकने लग गये अंदाज मेरे।

 

फिर हृदय के तार को छेड़ा किसी ने,
होश फिर उड़ से गये हैं आज मेरे।


[2]
चाहता था छोड़ दूँ उन आदतों को
जो दुखों का थीं सबब मेरे हमेशा।
सोचता था तोड़ दूँ उन बंधनों को
जो कि रहते थे मुझे घेरे हमेशा।

 

पर न अब तक आदतें वह छोड़ पाया,
बंधनों का मोह भी अब तक न टूटा।

 

शीघ्र ही विश्वास कर लेना किसी का,
था यही दुख का कदाचित् राज मेरे।

 

फिर हृदय के तार को छेड़ा किसी ने,
होश फिर उड़ से गये हैं आज मेरे ।


[3]
चाहता हूँ मैं तुम्हें ऐसा कहूँ कुछ,
शेष रह जाये न कुछ कहना कहीं पर,
खींच लूँ इतना निकट अपने तुम्हें मैं,
दूरियाँ सब खत्म हो जाएँ यहीं पर ।

 

इस तरह कुछ मैं तुम्हें अपना बना लूँ,
जन्म-जन्मांतर पराई हो न पाओ।

 

जिंदगी का गीत मैं कोई लिखूँ फिर,
तुम बनो उस गीत की आवाज़ मेरे।

फिर हृदय के तार को छेड़ा किसी ने,
होश फिर उड़ से गये हैं आज मेरे।।"

 


-गौरव शुक्ल

 

 

HTML Comment Box is loading comments...