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"एक अवधी गीत"

 


जब यादि गाँव की आवति है,तब सहर न तनिकौ भावति है।
(१)
बचपना जहाँ बीता हमार, खेलेन अनगिनतन खेल जहाँ,
लपचू, अट्टी-डंडा खेलेन, सुखु पायेन रेलम्पेल जहाँ।
वह धरती है केतनी पियारि, सब्दन माँ कैसे कहि पाइब,
वह वतनै ढेरु यादि आई, वहिते ज्यतनिहे दूरि जाइब।

 

वह भूमि जहाँ की दूब घास, लौ हमैं खूब पहिचानति है।
जब यादि गाँव की आवति है,तब सहर न तनिकौ भावति है।
(२)
वहु खुली हवा माँ साँस लेबु, सहरै आवति खन छूटि गवा;
ओंबी,होरा सपना हुइगे, क्वैरे का तापबु दूरि भवा।
'छोटे भैया उठि कै देखौ, सुकवा है कैसा दमकि रहा;
हन्नी हैं कैसी हुमकि रही, चंदरमा कैसा चमकि रहा।'

 

यहु कहि कहि ब्रम्ह मुहूरत माँ, को पापा तना जगावति है।
जब यादि गाँव की आवति है,तब सहर न तनिकौ भावति है।
(३)
वह ताजी रोटी घये केरि,अम्मा की मसका माँ चुपरी;
चौका माँ बैठि,खाबु पाटा पर,हिंया बतावौ कहाँ धरी।
मसका ते ज्यादा लाड़ु जहाँ, रोटी माँ चुपरा जाति रहै;
दुखु आवति जहाँ डेराति रहै,चौगिर्दा खुसी उड़ाति रहै।

 

हमरी देहीं के रोम रोम, का वहिकी यादि सतावति है।
जब यादि गाँव की आवति है,तब सहर न तनिकौ भावति है।
(४)
बसि गयेन सहर माँ गाँउ छोड़ि, सायद हमहूँ विकास कइ गेन,
मानकु है यहै विकास केर, हमहूँ यहु मानकु पूर किहेन।
अपनापन मगर छोंड़ि आयेन, कोलियन माँ वहे गाँव वाली;
लाखन मनइन के बीच हिंयाँ, हम बैठे हाँथ लिहे खाली।

 

थोथी विकास की परिभाषा, यह लागति हमैं चिढ़ावति है।
जब यादि गाँव की आवति है,तब सहर न तनिकौ भावति है।

 


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-गौरव शुक्ल
मन्योरा

 

 

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